Sunday, March 13, 2011

अपने ही अखाड़े में मात खाते महारथी

कुछ सबक हैं अवसरवादी राजनीतिज्ञों के लिए अपनी राजनीतिक दशा -दिशा पर पुनर्विचार के लिए वर्ना  हर दावं पेंच कि गहरी समझ रखने वालों के पैरों तले  कब  जमीन खिसक जाए इसका उन्हें इल्म भी न होगा...आखिर सब कुछ जानने वाले बड़े नादाँ हैं ये सियासतदां....
 
आसमान पर थूकने वाले ये भूल जाते हैं कि थूक पलट कर उन्हीं पर गिरेगा...राजनीति फिल्म मनोज वाजपेयी द्वारा बोला गया यह संवाद  ही देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर सर्वथा सटीक बैठता है....मौकापरस्ती  की राजनीति खूब फल-फूल रही है ...मौका पड़ते ही नेता सियासी सिद्धांतों को चोले की तरह बदल डालते हैं..... मगर उनका सियासी अवसरवाद का यह सिलसिला एक ऐसे मोड़ पर भी पहुँचता है जहाँ धक्का देकर गिरने उठने  का वाकया दोहराया जाता है मगर यह भी राजनीति का दिलचस्प पहलू है की इस बार गिराने वाला खुद शिकार हो जाता है...यानी शिकार करने को आये..शिकार हो के चले...गुजरे कुछ वक़्त में इसी अंदाज़ में अवसरवादी राजनीति के कई बड़े चेहरे सियासी मौकापरस्ती का शिकार हो गए...यहाँ भी दिलचस्प यही है कि सियासत ये महारथी अपने ही अखाड़े में मात खा जाते हैं... इस सिलसिले में अगर शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगोड़ा से की जाए तो जोड़तोड़ राजनीति से पी एम बने देवगौड़ा सबसे बड़ी मात उन्हीं के बेटे  एच डी कुमारस्वामी ने ही दी... उनसे बगावत कर भाजपा के साथ मिलकर कुमारस्वामी ने कुछ वक़्त के लिए ही सही मगर सत्ता - स्वाद तो ले ही किया....हाँ मगर अंजाम की बात करें तो जनता ने इस मौके के महारथी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया....कभी घूस लेकर समर्थन देने के लिए सुर्ख़ियों में रहे शिबू सोरेन  मौकापरस्त सियासत के सबसे बड़े चेहरों में शुमार किये जाते हैं...उनको  भी अपने बेटे ने ही अप्रत्यक्ष मात दी...मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले सोरेन को अपने बेटे के दबाव में पीछे हटना पड़ा और बेटे हेमंत सोरेन के  उप - मुख्यमंत्रित्व से संतोष करना पड़ा...इसी  तरह का दिलचस्प किस्सा कुलदीप बिश्नोई का है जो इन दिनों पार्टी के छ में से पांच विधायकों के पार्टी छोड़ जाने से दुखी हैं....सनद  रहे ये वही कुलदीप बिश्नोई हैं जिनके पिताश्री चौधरी भजन लाल को राजनीतिक पीएच. डी के तौर पर मशहूर हैं ...मगर इनकी तारीफ़ यही ख़त्म नहीं हो जाता बल्कि बताना जरूरी  है कि भजन लाल रातों -रात जनता पार्टी की सरकार को कांग्रेस सरकार में तब्दील कर दिया.... आज पांच विधायकों के पार्टी छोड़े जाने से भन्नाए हुए हैं ...पते कि बात यही राजनीति कि जिस जमीन में इन्होने अवसरवाद के बीज बोये आज वही काटने में इन्हें तकलीफ हो रही है...ये कुछ सबक हैं अवसरवादी राजनीतिज्ञों के लिए अपनी राजनीतिक दशा -दिशा पर पुनर्विचार के लिए हर दावं पेंच कि गहरी समझ रखने वालों के पैरों तले  कब जमीन खिसक जाए इसका उन्हें इल्म भी न होगा...आखिर सब कुछ जानने वाले बड़े नादाँ हैं ये सियासतदां....
 
- तरुण झा

Saturday, March 12, 2011

कांग्रेस में बढती कलह

अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो सूबे के जनता तो पहले ही हाथ का साथ छोड़ चुकी है...अब तो नेता और कार्यकर्ता भी हाथ से हाथ छुड़ा ही लेंगे..
जब जहाज डूबता है तो एक -एक कर उसके सवार उसका साथ छोड़ जाते हैं ...कुछ यही बिहार कांग्रेस में भी चल रहा है...चुनाव में मात खाने के बाद से पार्टी में जबरदस्त उथल -पुथल है.. महबूब अली कैसर के इस्तीफे से शुरू हुआ सिलसिला आज विधान परिषद् सदस्य महाचंद्र प्रसाद सिंह के त्यागपत्र तक जा पहुंचा ...गिनती के चार विधायकों वाली पार्टी  में मुंडे - मुंडे मतर्भिन्ने की लहर चल रही है..चार सीटों से संतुष्ट हुई पार्टी में असंतुष्ट कार्यकर्ताओं और नेताओं की फेहरिस्त तेज़ी से उभर रही है...गुटबाजी से घिरी कांग्रेस में नित दिन नए झमेले उजागर हो रहे हैं...दरअसल पार्टी की पकड़ दिनोंदिन कमज़ोर होती जा रही...मगर नेता दिनबदिन महत्वाकांक्षी होते चले जा रहे हैं....नतीजतन आपसी खींचतान के सिवा  कुछ निकल कर नही आ रहा ....पार्टी के पास सुदृढ़ नेतृत्व का भी अभाव है...कैसर की जमीनी पकड़ के हाल तो जगजाहिर हैं ...सदानंद सिंह  सरीखे अनुभवी  नेता ने सन्यांस का ऐलान कर पार्टी की चिंताएं और बढ़ा दी हैं ...ऐसे में पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी राज्य के कांग्रेसियों को कम नही छला..भला पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने किस चश्मे से देखा की उसे पार्टी में कोई केंद्रीय कार्यकारिणी में शामिल होने लायक नही दिखा ....अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो सूबे के जनता तो पहले ही हाथ का साथ छोड़ चुकी है...अब तो नेता और कार्यकर्ता भी हाथ से हाथ छुड़ा ही लेंगे..

-तरुण झा

Friday, March 11, 2011

लोकलाज से चले लोकराज

उच्चतम न्यायालय के निर्णयों  के आलोक में सरकार के लिए सबक़ साफ़ है...लोकराज ,लोकलाज से चले ...निर्णयों  के मूल में राजनीतिक नफा-नुक्सान नही बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों को अक्षुण बनाये रखने की भावना निहित हो ..
क्या लोकतंत्र अब संसद से नही सुप्रीम  कोर्ट से चलेगा ...सरकार के फैसले कायदे -क़ानून के बजाय राजनीतिक नफा-नुक्सान की कीमत पर होंगे...कम से कम सरकार से निष्क्रिय रुख पर सुप्रीम  कोर्ट के तल्ख़ रवैय्ये से तो यही तस्वीर उभर रही है...आखिर क्यों सरकार को राजा के खिलाफ कार्रवाई के उच्चतम न्यायालय की फटकार की जरूरत पड़ती है...मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में धांधली  को दृष्टिगोचर करने हेतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय का आलोक वांछित  होता है...हसन के खिलाफ वाजिब मामला दर्ज करने करने में न्यालय के संज्ञान की आवश्यकता  पड़ती है...वजह साफ़ है...सरकार में न केवल  इच्छाशक्ति की कमी बल्कि सरकार जम्हूरियत से जुड़े मसलों को सियासी चश्मे से देख रही है...लाख टके का सवाल यह है अगर लोकतंत्र से खिलवाड़ का यह सिलसिला यूँ ही जारी रहा तो हम दुनिया का सबसे कामयाब लोकतंत्र होने का दम किस तरह भर पायेंगे...
उच्चतम न्यायालय के निर्णयों  के आलोक में सरकार के लिए सबक़ साफ़ है...लोकराज ,लोकलाज से चले ...निर्णयों  के मूल में राजनीतिक नफा-नुक्सान नही बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों को अक्षुण बनाये रखने की भावना निहित हो ..

- तरुण झा