कुछ सबक हैं अवसरवादी राजनीतिज्ञों के लिए अपनी राजनीतिक दशा -दिशा पर पुनर्विचार के लिए वर्ना हर दावं पेंच कि गहरी समझ रखने वालों के पैरों तले कब जमीन खिसक जाए इसका उन्हें इल्म भी न होगा...आखिर सब कुछ जानने वाले बड़े नादाँ हैं ये सियासतदां....
आसमान पर थूकने वाले ये भूल जाते हैं कि थूक पलट कर उन्हीं पर गिरेगा...राजनीति फिल्म मनोज वाजपेयी द्वारा बोला गया यह संवाद ही देश के वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर सर्वथा सटीक बैठता है....मौकापरस्ती की राजनीति खूब फल-फूल रही है ...मौका पड़ते ही नेता सियासी सिद्धांतों को चोले की तरह बदल डालते हैं..... मगर उनका सियासी अवसरवाद का यह सिलसिला एक ऐसे मोड़ पर भी पहुँचता है जहाँ धक्का देकर गिरने उठने का वाकया दोहराया जाता है मगर यह भी राजनीति का दिलचस्प पहलू है की इस बार गिराने वाला खुद शिकार हो जाता है...यानी शिकार करने को आये..शिकार हो के चले...गुजरे कुछ वक़्त में इसी अंदाज़ में अवसरवादी राजनीति के कई बड़े चेहरे सियासी मौकापरस्ती का शिकार हो गए...यहाँ भी दिलचस्प यही है कि सियासत ये महारथी अपने ही अखाड़े में मात खा जाते हैं... इस सिलसिले में अगर शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री एच डी देवगोड़ा से की जाए तो जोड़तोड़ राजनीति से पी एम बने देवगौड़ा सबसे बड़ी मात उन्हीं के बेटे एच डी कुमारस्वामी ने ही दी... उनसे बगावत कर भाजपा के साथ मिलकर कुमारस्वामी ने कुछ वक़्त के लिए ही सही मगर सत्ता - स्वाद तो ले ही किया....हाँ मगर अंजाम की बात करें तो जनता ने इस मौके के महारथी को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया....कभी घूस लेकर समर्थन देने के लिए सुर्ख़ियों में रहे शिबू सोरेन मौकापरस्त सियासत के सबसे बड़े चेहरों में शुमार किये जाते हैं...उनको भी अपने बेटे ने ही अप्रत्यक्ष मात दी...मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाले सोरेन को अपने बेटे के दबाव में पीछे हटना पड़ा और बेटे हेमंत सोरेन के उप - मुख्यमंत्रित्व से संतोष करना पड़ा...इसी तरह का दिलचस्प किस्सा कुलदीप बिश्नोई का है जो इन दिनों पार्टी के छ में से पांच विधायकों के पार्टी छोड़ जाने से दुखी हैं....सनद रहे ये वही कुलदीप बिश्नोई हैं जिनके पिताश्री चौधरी भजन लाल को राजनीतिक पीएच. डी के तौर पर मशहूर हैं ...मगर इनकी तारीफ़ यही ख़त्म नहीं हो जाता बल्कि बताना जरूरी है कि भजन लाल रातों -रात जनता पार्टी की सरकार को कांग्रेस सरकार में तब्दील कर दिया.... आज पांच विधायकों के पार्टी छोड़े जाने से भन्नाए हुए हैं ...पते कि बात यही राजनीति कि जिस जमीन में इन्होने अवसरवाद के बीज बोये आज वही काटने में इन्हें तकलीफ हो रही है...ये कुछ सबक हैं अवसरवादी राजनीतिज्ञों के लिए अपनी राजनीतिक दशा -दिशा पर पुनर्विचार के लिए हर दावं पेंच कि गहरी समझ रखने वालों के पैरों तले कब जमीन खिसक जाए इसका उन्हें इल्म भी न होगा...आखिर सब कुछ जानने वाले बड़े नादाँ हैं ये सियासतदां....
- तरुण झा
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