उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में सरकार के लिए सबक़ साफ़ है...लोकराज ,लोकलाज से चले ...निर्णयों के मूल में राजनीतिक नफा-नुक्सान नही बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों को अक्षुण बनाये रखने की भावना निहित हो ..
क्या लोकतंत्र अब संसद से नही सुप्रीम कोर्ट से चलेगा ...सरकार के फैसले कायदे -क़ानून के बजाय राजनीतिक नफा-नुक्सान की कीमत पर होंगे...कम से कम सरकार से निष्क्रिय रुख पर सुप्रीम कोर्ट के तल्ख़ रवैय्ये से तो यही तस्वीर उभर रही है...आखिर क्यों सरकार को राजा के खिलाफ कार्रवाई के उच्चतम न्यायालय की फटकार की जरूरत पड़ती है...मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति में धांधली को दृष्टिगोचर करने हेतु उच्चतम न्यायालय के निर्णय का आलोक वांछित होता है...हसन के खिलाफ वाजिब मामला दर्ज करने करने में न्यालय के संज्ञान की आवश्यकता पड़ती है...वजह साफ़ है...सरकार में न केवल इच्छाशक्ति की कमी बल्कि सरकार जम्हूरियत से जुड़े मसलों को सियासी चश्मे से देख रही है...लाख टके का सवाल यह है अगर लोकतंत्र से खिलवाड़ का यह सिलसिला यूँ ही जारी रहा तो हम दुनिया का सबसे कामयाब लोकतंत्र होने का दम किस तरह भर पायेंगे...
उच्चतम न्यायालय के निर्णयों के आलोक में सरकार के लिए सबक़ साफ़ है...लोकराज ,लोकलाज से चले ...निर्णयों के मूल में राजनीतिक नफा-नुक्सान नही बल्कि लोकतान्त्रिक मूल्यों को अक्षुण बनाये रखने की भावना निहित हो ..
- तरुण झा
- तरुण झा
तरूण जी इसी का नाम राजनीति है। अगर सरकार हर मसले को जल्द निपटा ले या फिर किसी समस्या का जल्द समाधान कर दे तो सरकार सुधर नहीं जाएगी। लेकिन एक बात तो है हमारे माननीय प्रधानमंत्री जी से कुछ भी पूछों तो वो मजबूरी का नाम ले देते है।
ReplyDeleteNice Yaar and perfect also. When Executive and Legislative will not deliver their work with perfection , Certainly any one has to take lead. But It is not in the favour of Democracy. We claim to be a Biggest Democracy but Now there is time to reform from Top to Bottom.
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