सुशासन बाबू की बम्पर विक्ट्री के बाद यह पहला उपचुनाव है और इस बीच हालात कई करवट ले चुका है ...फारबिसगंज प्रकरण , मंत्रियों की दागदारी के किस्सों का खुलासा और जदयू के बागियों की खुलकर कर सरकार के खिलाफ मुखालफत सरीखे कई अहम् मुद्दे विपक्ष के हाथ लग गए हैं
पूर्णिया उपचुनाव के बहाने प्रदेश में एक बार फिर नए सियासी समीकरण बनते दिख रहे हैं....हालांकि सत्तधारी जदयू- भाजपा के लिहाज़ से इस उपचुनाव में दांव पर तो ज्यादा कुछ नहीं है...दिवंगत केसरी की पत्नी को मैदान में खड़ा कर भाजपा सहानुभूति की लहर के सहारे अपनी सीट बचा लेगी ...इसकी उम्मीद भाजपा को भी है और राजनीतिक जानकारों को भी...लेकिन सुशासन बाबू की बम्पर विक्ट्री के बाद यह पहला उपचुनाव है और इस बीच हालात कई करवट ले चुका है ...फारबिसगंज प्रकरण , मंत्रियों की दागदारी के किस्सों का खुलासा और जदयू के बागियों की खुलकर कर सरकार के खिलाफ मुखालफत सरीखे कई अहम् मुद्दे विपक्ष के हाथ लग गए हैं लिहाज़ा विरोधी भी चुनाव में फायदे को लेकर नाउम्मीद नहीं हैं... जहाँ इस उपचुनाव का सबसे बड़ी खासियत मुख्य विपक्ष राजद व लोजपा द्वारा मैदान में न होने है वहीँ चुनाव की आड़ में अपनी राहें जुदा करने की चल रही कवायद ने इस उपचुनाव की अहमियत को बढ़ा दिया...राजद का CPI को समर्थन व लोजपा का उससे उलट कांग्रेस को समर्थन देने के कदम से दोनों रहे बिलग होने की तस्वीर बनती दिख रहीं हैं...यानी लालू के बुरे वक़्त में सात जन्मों तक सियासी रिश्ता निभाने कसम खाने वाले पासवान सात महीने में ही बेवफाई पर उतर आये... बहरहाल लालू यादव हमारे सुझाया जूमला ही गुनगुनाते नज़र आ सकते हैं ...
बेरूखी से कह दिया अब न कोई नाता रहा ।
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