Tuesday, June 28, 2011

शंखनाद .....फुस्स.....फुस्स...

मौका था कमल फूल वाली सरकार का हाथ वाली सरकार से दो - दो हाथ करने का...जोश ही जोश में  भगवान् कृष्ण के अंदाज़ बिहारी बाबू ने शंख फूंकने  का मन बना लिया ...इरादा था बिलकुल पक्का ....थाम लिए शंख ....
महंगाई के खिलाफ करने लगे एलान - ए -जंग ....शत्रुघ्न बाबू इहे पांचजन्य बजाकर करने चले थे महंगाई के खिलाफ जंग का एलान ....पर ई का  ...चार चार शंख बज रहे थे लेकिन जिस शंख पर था सबका नज़र ऊ तो.....फुस्स ....फुस्स ...और फुस्स ही हुए जा रहा था ....अरे शत्रु भईया ...जिसका काम उसी को साजे दूजा करे तो डंडा बाजे ...शंख तो  पंडी जी सब बजा ही रहे थे...कहे बेकारे में एतना जोर लगाये ....शंख तो बजा नहीं उलटे अपनी और पार्टी की भद्द पिटवा दिए...ख्वामखाह मीडिया वालों को क्लास लेने का मौक़ा दे दिए...खैर ,  शंखनाद तो हुआ नहीं अलबत्ता नाराजगी का बिगुल जरूर बज गया....मंत्री महोदय गिरिराज बाबू बीच्चे में सभा छोड़ कर चल दिए...क्या पूछे.....  कारण ...वहीँ कुर्सी न ....मंच पर मनपसंद कुर्सी यानी जगह नहीं मिला सो पारा हो गया हाई...अब गिरिराज  बाबू  ठहरे नेता  आदमी  ...कुर्सिये के लिए सारी जंग है...अ कुर्सिये नहीं मिलेगा तो न शंख बजेगा न घंटा के अंदाज़ में गाल फुलाए चल दिए...भाई भजप्पा वाले सब.... अईसे जो आपके नेता सब शंख फुस्स-फुसायेंगे...गाल फुलायेंगे ...तो काम चलेगा...कमल का फूल तो मुरझा न जाएगा जी...अ गिरिराज बाबू आप भी ई बात बढ़िया से समझ लीजिये...न तो फिर भी कुर्सी नहिये मिलेगा...

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