औरंगाबाद के दाऊद नगर में मौजूद सदियों पुराना दाऊद खान का किला इतिहास के पन्नों में अपनी अहम पहचान रखता है.... ऐतिहासिक शिल्प - वास्तुकला की बेहतरीन मिसाल के साथ - साथ दाऊद खान की कुशल युद्ध नीति का परिचायक भी है...यह किला खासमखास सिपहसलार दाऊद खान की पलामू फतह की यादगारी के तौर पर मशहूर है.....
कहा जाता है कि सन १६६० में औरंगजेब ने अपने विश्वासपात्र दाऊद खान को साठ हज़ार सैनिकों व साजोसामान से लैस कर पलामू फतह करने के लिए भेजा....इस सिलसिले दाऊद खान ने पलामू कूच किया ....पलामू पर जीत हासिल करने के बाद पटना लौटने दौरान दाऊद को मालूम हुआ कि अच्छा में मिगल खजाने की लूट का सिलसिला गुजरे काफी वक़्त से लगातार जारी है...लूट पर लगाम लगाने के इरादे से दाऊद खान ने सिलौटा-बखौरा गाँव में सैन्य छावनी बनाने का फैसला किया ...मगर दाऊद खान के लिए छावनी बनाना टेढ़ीखीर बन गया ....दरअसल इसी इलाके के अच्छा गाँव में दबंगों द्वारा मुगलों के खजानों को लूट लिया जाता था...ये इतने शक्तिशाली थे कि महीनों यह किला नहीं बनाया जा सका था...दिन में जहाँ किले का निर्माण कार्य होता था वहीँ रात को ये हल्ला बोल उसे ढहा देते थे...मगर दाऊद ने अपनी कुशल युद्ध नीति के तहत यहाँ बहरी जातियों को लाकर बसा दिया...नतीजा ये हुआ कि दोनों समुदाय आपस में भीड़ गए ...अंततः दस सालों में इस दस एकड़ में फैली सैन्य छावनी का निर्माण पूरा हो सका और लूट का सिलसिले को रोका जा सका...
यह किला न केवल दाऊद खान की युद्धकला और उसके सर्वोत्तम सेनानायक होने का गवाह है बल्कि अनुपम शिल्पकला का अद्भुत नमूना है...जरूरत है तो बस सरकार और लोगों को इसके प्रति संजीदा होने की ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजा जा सके.
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